ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 7
पाठ का परिचय (Introduction):
'विनय के पद' भक्तिकाल की 'सगुण राम भक्ति शाखा' के सबसे महान कवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित हैं। यह कविता उनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'विनय पत्रिका' से ली गई है। इन पदों में तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अनन्य (Exclusive) और दास्य-भाव (Servitude) की भक्ति प्रकट की है। कवि का मानना है कि जो लोग श्रीराम और माता सीता से प्रेम नहीं करते, वे चाहे कितने भी प्रिय या निकट संबंधी क्यों न हों, उन्हें परम शत्रु (दुश्मन) समझकर हमेशा के लिए त्याग देना चाहिए।
शब्दार्थ: जाके = जिसके (Whom); बैदेही = माता सीता (Daughter of King Videha/Janaka); तजिये = त्याग देना चाहिए (Should abandon); ताहि = उसे; कोटि = करोड़ों (Millions); बैरी सम = शत्रु/दुश्मन के समान (Like an enemy); जद्यपि = यद्यपि (Even if); परम सनेही = बहुत प्यार करने वाला (closely related); महतारी = माता (Mother); कंत = पति (Husband); ब्रज-बनितन्हि = ब्रज की गोपियों (Gopis of Braj); मुद-मंगलकारी = कल्याणकारी (Auspicious/Beneficial); अंजन = सुरमा/काजल; एतो मतो हमारो = यही मेरा विचार/मत है (This is my opinion)।
प्रसंग: इस पद में तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के मन में सीताराम के प्रति प्रेम नहीं है, भले ही वह हमारा कितना भी सगा संबंधी (सगे-संबंधी) क्यों न हो, उसे तुरंत छोड़ देना चाहिए।
व्याख्या:
(नोट: अधिकांश ICSE बोर्ड में विनय के पद का प्रथम पद्यांश "जाके प्रिय न राम-बैदेही" ही सर्वाधिक पूछा जाता है और वही मुख्य है। यदि दूसरा पद 'कहा कहौं छबि आजु की...' है, तो उसका भाव श्रीराम और उनके भाइयों के सुंदर स्वरूप का कवि द्वारा मनोहारी वर्णन है।)
तुलसीदास के 'राम' का स्वरूप:
तुलसीदास के राम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं। वे शक्तिशाली, दयालु और भक्तों के रक्षक हैं। तुलसीदास मानते हैं कि केवल राम के नाम का जाप और उनके चरणों की दास्य-भक्ति (सेवक भाव) से ही मनुष्य इस संसार रूपी भवसागर (Ocean of material existence) को पार कर सकता है।
प्रश्न 1: तुलसीदास जी के अनुसार किसे करोड़ों शत्रुओं के समान मानकर त्याग देना चाहिए?
उत्तर: गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार, जिस व्यक्ति के हृदय में भगवान श्रीराम और माता सीता (बैदेही) के लिए श्रद्धा और प्रेम नहीं है, या जो राम-भक्ति का विरोधी है, हमें उस व्यक्ति को करोड़ों शत्रुओं (दुश्मनों) के समान समझकर तुरंत त्याग देना चाहिए। कवि का मानना है कि ईश्वर-विरोधी व्यक्ति चाहे हमारा कितना भी प्यारा (परम सनेही) या सगा रिश्तेदार ही क्यों न हो, उसका साथ हमारे आध्यात्मिक जीवन (Spiritual life) के लिए हानिकारक है और उसे छोड़ने में ही हमारी भलाई है।
प्रश्न 2: कवि ने राम-विरोधियों को त्यागने के लिए किन-किन महान भक्तों के उदाहरण दिए हैं?
उत्तर: कवि ने अपने तर्क को सिद्ध करने के लिए पुराणों के पाँच ऐसे महान
भक्तों के उदाहरण दिए हैं जिन्होंने ईश्वर के लिए अपने सबसे करीबी रिश्तों को त्याग दिया:
1. प्रह्लाद ने रामभक्ति-विरोधी अपने सगे 'पिता' (हिरण्यकशिपु) को त्याग दिया।
2. विभीषण ने अहंकार और पाप में डूबे अपने सगे 'भाई' (रावण) को त्याग दिया।
3. भरत ने रामजी को वनवास भेजने वाली अपनी सगी 'माता' (कैकेयी) को त्याग दिया।
4. राजा बलि ने भगवान वामन को दान देने से रोकने वाले अपने 'गुरु' (शुक्राचार्य) को
त्याग दिया।
5. ब्रज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पाने के लिए अपने 'पतियों' को त्याग दिया।
इन सभी के लिए यह त्याग कल्याणकारी सिद्ध हुआ।
प्रश्न 3: "अंजन कहा आँखि जेहि फूटै" द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर: इस लोकोक्ति (Proverb) का शाब्दिक अर्थ है - "उस काजल (सुरमे) को
आँख में लगाने का क्या लाभ, जिसके लगाने से आँखें ही फूट या ख़राब हो जाएँ।"
इस कहावत के माध्यम से कवि यह गहन आध्यात्मिक संदेश देना चाहते हैं कि सांसारिक रिश्ते-नाते और मित्र हमें
सुख पहुँचाने के लिए होते हैं (जैसे आँख को सुंदर बनाने के लिए काजल)। लेकिन यदि वही रिश्ते-नाते हमें भगवान
की भक्ति से दूर करने लगें और हमारे पतन (Downfall) का कारण बनें, तो वे उस बुरे काजल के समान हानिकारक हैं
जो आँखों की रोशनी छीन लेता है। इसलिए ऐसे ईश्वर-विरोधी रिश्तों को तुरंत छोड़ देना चाहिए।